majduro ki durdasha
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दुनिया में हर तरह की समस्याए है और उनका निवारण भी उसी के आधार पे होता है, लेकिन जब कोई समस्या किसी देश के मंत्रियो, प्रधान मंत्री, मीडिया और आम से लेके खास तक सबके संज्ञान में हो फिर भी समस्या का समाधान न निकले तो आप इसे क्या कहेंगे?

जब से Lock-down हुआ तब से मजदूर और उनसे जुड़े पलायन का मामला सुर्खियों में है, लेकिन अब तक इसका सही समाधान नहीं निकला है.

यहाँ लोग मजदूरों के आंसुओ से अपनी राजनीती की खेत सींच रहे है. आखिर इस राजनीती के खेल में कब तक मध्यम और निम्न वर्ग के लोगो को मोहरा बना के यूज़ किया जायेगा। कभी उन्ही मध्यम और निम्न वर्गों के द्वारा चुने हुए नितीश कुमार जैसे मुख्यमंत्री उन्ही लोगो को अपने घर आने से रोकते है, तो कभी प्रियंका वाड्रा जैसे लोग बसों का झूठ फैला के ऑटो, बाइक और ट्रक मुहैया करा उनका मजाक बनाते है.

श्रीमती प्रियंका वाड्रा जी आप हमें ये बताइये की लास्ट टाइम आपने ट्रक की सवारी कब की थी, कब आप स्कूटी पे और ऑटो में बैठ के 200 से 1500 km गईं थी. अरे मैडम कम से कम मजाक तो मत बनाइये। जनता के प्रतिनिधि बन आप उनके तकलीफो की राजनीती करते हो शर्म आनी चाहिए।

अरे किस किस्म के नेता हो आप लोग यार, कहा गए वो राजनेता जो जनता के लिए उनकी सहूलियतों के लिए राजनीती करते थे, आज तो बस जनता की जनता की राजनीती की जा रही है.

Lockdown आम लोगो को नहीं पता था की इतना टाइम तक खीचेगा, लेकिन क्या भारत सरकार को नहीं पता था? आपने जो कदम आज उठाये है, जो भी ट्रैन, बसेस आज चलाये जा रहे है वो पहले क्यों नहीं किया गया, क्या जो एहतियाद बरत कर आज ये सेवाएं चलाई जा रही है वो पहले से नहीं की जा सकती थी? भारतीय रेलवे में कर्मचारियों की कोई कमी नहीं है क्या आप अपनी सम्पूर्ण ताक़त का इस्तेमाल कर इस कठिन समय में लोगो को अपने घर पहुंचाने में मदद नहीं कर सकते थे? आपने इस वर्ग के लोगो के बारे में पहले से कोई योजना क्यों नहीं बनाई?

क्या गलती थी उन मजदूरों की जो पैदल निकल तो गए लेकिन कभी अपने घर नहीं पहुंच पाए, क्या गलती है उन मासूम बच्चो की चिलचिलाती धुप में तप्ति सड़को पर चलने को मजबूर है?

साहब AC में बैठ के बयान दे देने, संवेदना व्यक्त कर देने, दो आंसू बहा देने और मुवावजे के 2, 4 लाख दे देने को समस्या का समाधान मानते हो तो एक बार अपने AC वाले कमरों से बाहर निकल कर, अपने घर के लिए, परिवार के लिए और पेट के लिए धुप में खड़े होकर देख लो.

साहब जो कदम उन अमीरो को बाहर देश से लाने के लिए उठाये गए, वो कदम इन मध्यम और निम्न वर्ग के लिए क्यों नहीं उठाये गए? सिर्फ इसलिए की उनके पास पैसा था, और एक मोटी रकम टिकटों पे खर्च करने की उनकी औकात थी. अरे महाशय एक बार बोलते तो, जो मजदूर अपने परिवार के पालन पोषण के लिए अपने घर से हजारो किलोमीटर दूर आके, सैकड़ो गालिया खा के, आधे पेट पेट खाना खा के और आधी नींद सो कर काम कर सकता है, वो मजदुर अपने परिवार से मिलने के लिए, अपनी सारी जमा पूंजी आपके हाथ में रख देता।

इस पुरे त्राश्दी में अगर सबसे ज्यादा कोई प्रभावित हुआ है तो वो है माध्यम और निम्न वर्ग, सडको पर सड़क हादसे विकराल रूप धारण किये हुए है, पटरियों पर ट्रेने और और जो इन सबसे बच जाये उसे पेट की आग झुलसा देती है.

One thought on “मजदूरों की ये दुर्दशा किसने की, कौन कर रहा है आंसुओ से राजनीती?”
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